शैखु़ल आज़म,, हज़रत मख़दूम शाह मीना रहमतुल्लाह अलैह हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रजि़अल्लाहु तआला अनहू की औलादों में से हैं। आपके वालिद बुजु़र्गवार शैख़ कुतुबुद्दीन दिल्ली से जौनपुर आऐ और वहां से दिलमऊ में आकर क़याम किया। दिलमऊ से हज़रत हाजिउल हरमैन शैख क़वामुद्दीन लख़नवी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत मे पहुँचकर कमाले इख़लास बहेम पहुंचाया, ऐसा की नमाज़ में आप के और उनके बीच में कोई और ख़ड़ा ना हो सकता।
चंद रोज़ के बाद शैख़ क़वामुद्दीन लख़नवी रहमतुल्लाहअलैह ने हुक्म फरमाया-
“कुतुबुद्दीन, तुम निका़ह करो ,तुम्हारे एक लड़का पैदा होगा, उस से हमारा नाम ज़िन्दा रहेगा और ख़ानवद-ए-चिश्तिया रौशन होगा। “
चुनान्चे शेख क़ुतुबुद्दीन ने निकाह किया, फिर हज़रत मखदूम शेख मीना रहमतुल्लाह अलैह की विलादत हुई।
जब हज़रत शाह मीना रहमतुल्लाह अलैह की पैदाइश की खबर शेख क़वामुद्दीन लख़नवी रहमतुल्लाह अलैह को पहुंची तो फरमाया, “आवा मोरा मीना”। इस वजह से आप “शैख़ मीना” के नाम से मशहूर हुए।
“बीबी खासा” जो शैख़ कवामुद्दीन लख़नवी रहमतुल्लाह अलैह की अहले ख़ाना थीं,ने आपको दूध पिलाया। मशहूर है कि जब आप अपनी वालिदा माजिदा के पेट मे थे, तो लोग बारहा तिलावत और ज़िक्र की आवाज़ उन के पेट से सुनते थे।आप अपने बचपन में जब रमज़ान का महीना होता तो दिन को दूध न पीते। रात को आप की वालिदा गोद मे लेकर सोती, मगर जब जागतीं तो आप को चारपाई के तले सज़दे में पातीं।आप जब दो तीन बरस के हुए तब अपने वालिद माजिद से कहते ये चिड़ियाँ जो आसमान में उड़ती है वो मुझको दो , उन से कहो कि शैख़ मीना तुमको बुलाते है चिड़ियाँ फौरन उतर आतीं और आपके सामने बैठी रहतीं जब आप रुख़्सत देते तब उड जातीं। पांच साल की उम्र में जब मकतब पहुंचे तो उस्ताद ने कहा बोलो “अलिफ” तो आपने फ़रमाया “अलिफ” जब मुअल्लिम ने कहा “बे” आप ने फरमाया “दूजा के?” (दूसरा कौन)। उसके बाद आपने अलिफ के बारे में ऐसे हक़ाएक़ बयान किए कि उस्ताद और दीगर हाज़रीन बेखुद हो गये। मुअल्लिम ने जान लिया कि ये मादरज़ाद वली हैं इसलिए मकतब में आपकी आमद को ही गनीमत समझते।दस साल तक हज़रत शाह क़वामुद्दीन के साया-ए-तरबियत में रहे। जब आपकी उम्र 12 साल की हुई तो मक़ामे क़ुतुबियत पर फाएज़ हो गए। कम उम्र में ही बड़े-बड़े उल्मा-ए-ज़माना आपके पास अपने मसाएल लेकर आते और तसल्ली बख़्श जवाब पाते।हज़रत शेख क़वामुद्दीन के विसाल के बाद 15 साल की उम्र में आप ही के मुरीदो मजाज़ “हज़रत मखदूम शेख सारंग रहमतुल्लाह अलैह” से मुरीद हो गये। आप अपने पीरो मुर्शिद से बहुत मोहब्बत करते। अक्सर नालैन चोबी पहनकर ग्यारह बारह कोस लखनऊ से मझगवां पीर की ज़ियारत को जाते।“ऐनुल विलायत” मे मरक़ूम है कि, एक बार शैख़ सारंग रहमतुल्लाह अलैह ने आपको किसी शहर में भेजा जब आप उस शहर से होकर दोबारा शैख़ सारंग रहमतुल्लाह अलह की ख़िदमत मे पहुंचे तो शैख़ सारंग रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया “उस शहर में एक और दरवेश हैं तुमने उनसे मुलाकात की या नहीं?” आपने फरमाया “मुझको आपही की मोहब्बत काफी है” शैख़ सारंग रहमतुल्लाह अलय ने हज़रत शैख़ मीना रहमतुल्लाह अलैह की उस बात से खुश होकर आपको ख़िरक़ा-ए- मुबारक अता फरमाया।
आपका का विसाल 23 सफ़र 884 हिजरी मुताबिक 16 मई 1479 ई० को हुआ आपका मज़ार मुबारक लखनाऊ मे ज़्यारत गाह ख़ासो आम है।आपने सिर्फ दो हज़रात को इजाज़त-व-खिलाफ़त से नवाज़ा। हज़रत क़ुतुबुद्दीन लखनवी रहमतुल्लाह अलैह हज़रत मखदूम शेख सअदुद्दीन खैराबादी रहमतुल्लाह अलैह।

आज का अपराध न्यूज़
इरफान खान बांगरमऊ उन्नाव।

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