पोस्टमैन-: एक समय था जब साइकिल पर खाकी कपड़े पहने और हाथों पर झोला टांगे जब भी डाकिया घरों के पास से गुजरता था तो हर किसी की आंखें उम्मीदों से मुस्कुरा उठती थी। बूढ़ी आंखों में बेटे के आने की खबर, तो नन्हें कदमों को पिता के आने की आहट तो वहीं दूर ससुराल में बैठी बेटी को मायके की खबर के लिए दिल में बेचैनी हो उठती थी और बस दिल-दिमाग में एक ही बात दौड़ती थी कि डाकिया बाबू मेरे लिए खत लेकर आए हैं।
चिट्ठी न कोई संदेश, ना जाने कौन सा देश .. कहां तुम चले गए
डाक विभाग की अहमियत आज की पीढ़ी शायद ही समझे। मोबाईल, फोन, एस.एम.एस.,कुरियर और इंटरनैट ने संदेशों का आदान-प्रदान तो आसान कर दिया मगर इंतजार और रोमांच का वो लम्हा छीन लिया जिसका कभी लोग बेसब्री से इंतजार किया करते थे। वक्त बदल गया है लेकिन शायद वो इंतजार अभी भी लोग नही भूले हैं जो कभी डाकिया के लिए किया करते थे। आज भी छोटे कस्बों और गांवों में बड़ी शिद्दत से डाकिए का इंतजार होता है। पोस्ट ऑफिस आज भी बहुतों के लिए बहुत कुछ है।

चिट्ठी लिखने की प्रवृति हो गई खत्म
चिट्ठियों का दौर खत्म होने से लोगों के अंदर लिखने की प्रवृति खत्म हो गई है। आज की पीढ़ी लिखना नहीं जानती। कम से कम चिियों की वजह से लोगों के अंदर लिखने की तो आदत थी। फेसबुक, वाट्सएप के जमाने में हमारे अंदर का धैर्य खत्म हो रहा है। नई तकनीक के आने से जमाना जरूर तेज हो गया है। एक फोन घुमाया और जहां चाहा बात कर ली। वह दौर धीमा जरूर था लेकिन लोगों के अंदर संवेदनाएं तो थीं जो अब खत्म हो गई है।

खत्म हो गया अब पोस्टमैन अंकल का इंतजार
गौरतलब है कि उस जमाने में बड़े चाव से प्रियजनों के पत्र का इंतजार रहता था। डाकिए की साइकिल की घंटी सुनते ही बांछें खिल जाती थीं। सभी लोग डाकिए से मिलने के लिए दौड़ पड़ते थे। कई बार तो सबसे पहले चिट्ठी पढऩे के लिए छीना-झपटी भी हुआ करती थी। लंबे इंतजार के बाद चिी में लिखे एक-एक शब्द को पढक़र जो अंदर महसूस होता था, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। प्रियजनों की सिर्फ चिट्ठी नहीं, उसमें उनका लिपटा प्यार भी आता था।

चिट्ठियों के जमाने में रिश्ते धीरे-धीरे पकते थे
चिट्ठियों के उस दौर की बात ही अलग हुआ करती थी। चिट्ठियों में भाव और भाषा का संगम हुआ करता था। पत्र लिखते समय हम संवेदनाओं की गहराई में उतरते थे। पत्रों के उस जमाने में जीवन में रस था जो अब खत्म हो गया है। चिट्ठियों के जमाने में रिश्ते धीरे-धीरे पकते थे। उनमें संवेदनाएं होती थीं। उस दौर में जीवन इतनी नकारात्मकता नहीं थी। आज की तरह हालात नहीं थे कि किसी के प्रति मन में आवेश आया और फोन उठाकर भड़ास निकाल दी।

डाकियों को लोग मानते थे देवदूत
उस दौर में पत्र लिखने की कला श्रेष्ठ मानी जाती थी। पत्र लिखना सिर्फ कुशल-क्षेम जानने का माध्यम नहीं था बल्कि पत्रों के जरिए भाषा के सौंदर्य का विकास होता था। पत्र लिखते हुए हमारे अंदर संवेदनाओं का जन्म होता था। साहित्य में रुचि लगने वाले लोग पत्र के माध्यम से भी अपनी भावनाओं को शब्द देते थे। प्रेमी प्रेमिका ही नहीं बल्कि पत्नियां भी चिट्ठी के सहारे ही कई-कई महीने अपनों से दूर रह लेती थी। डाकियों को तो लोग देवदूत माना करते थे।

विछोह की पीड़ा को अपनों के पत्र ही करते थे दिल को सुकून
उस जमाने में भले ही एक-दूसरे का कुशल क्षेम जानने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था लेकिन उस जमाने की एक अलग रुमानियत थी। माता-पिता को पत्र लिखते समय आंसू से पन्ने भींग जाते थे। जब भी घर से पत्र आया करता था धडक़नें बढ़ जाया करती थीं। विछोह की पीड़ा को पत्र पढक़र ही शांत करते थे।

उपवेन्द्र कुमार राजपूत अलीगढ़ एडिटर आज का अपराध न्यूज़ 9758474237

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