मैनपुरी । रविवार को कबीर आश्रम पर हुए सत्संग में आश्रम के महंत अमर साहेब ने बताया कि जिस प्रकार दीपक से किसी घर में रोशनी हो जाती तब घर के अंदर रखी हुई सारी वस्तुएं दिखाई देने लगती हैं इसी प्रकार अपने शरीर रूपी घट में विवेक का दीपक है तो अंधेरा साफ नजर आता हमारी आत्मा का ज्ञान ही गुरू है एवं मन ही चेला है ऐसी समझ जिसके अंदर आ गई जिसने अपनी आत्मा गुरू को अपना मन समर्पित कर दिया वास्तव में वही सच्चा मनुष्य है क्योंकि उसका मन श्रेष्ठ हो गया अन्यथा मन इंद्रियों एवं वासना की गुलामी में है तो मनुष्य शरीर होते हुए माटी का एक ढेला समझा जाए यह संसार बोरे गांव की अनोखी बस्ती के समान है यहां कोई हंसता है तो कोई रोता है इस अनोखी दुनिया की रीत अनोखी है यहां सुख बहुत महंगा मिलता है दुख फ्री में सत्ता ही मिल जाता या यूं कहें कि सुख की आशा ही दुख की जननी है अतः शुभ कर्मों शुभ संस्कारों की पीड़ा ही मानवता है।
महन्त बताते हैं कि 1 दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त समय में एक संत की आवाज कह रही थी उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है तथा जो सोवत है वह खोवत है जो जागत है सो पावत है सदगुरु कबीर साहब ने कहा जागो लोगों मत सोवो करो नींद से प्यार जैसा सपना रेन का वेसा यह संसार हर जगह जागने की बात कही जाती है आखिर जागत नींद न कीजिए कुछ लोग दिखावा मैं जागते हैं फिर भी सो रहे हैं इन सबके जानने के लिए एक महामंत्र काफी होगा तब जानू सोवत से जागें विषय वासना मनसी त्यागी हमारे मनसी पांच विषयों की अज्ञान अंधेरी हट जाने से ही जागना हो सकता अतः अंदर की आग जिसे विवेक नेत्र कहते उसके खुल जाने से सीरियल सवेरा भी हो जाता उसी क्षण जागना भी हो जाता जो जाग जाता है वही इस असत्य संसार से भागता भी है पहलाद मीरा सबरी बुद्ध महावीर कबीर सूर तुलसी स्वामी विवेकानंद स्वामी दयानंद आदि अनेक महापुरुषों जागते गए वहीं भागते गए जो जाग जाता वहीं सद्गुण एवं आत्मा परमात्मा का सच्चा लाल भी हो जाता है अभी सोया हुआ है एवं संसार से जिसे उपरामता हो चली है वह भी जाकर सच्चा लाल हो सकता है लेकिन जो एक बार जागकर पुनः बिषय बासना में लिप्त हो कर सो रहा है उसके तो बुरे हाल समझे जाएं क्योंकि उसके मन में अहंकार है । अहंकारी मन में शिक्षा काम नहीं करती इस प्रकार रावण चारों वेदों का ज्ञाता होते हुए भी अहंकार के कारण किसी की उचित बात नहीं मानता अंत में सिर्फ विनाश हुआ इसलिए कहा है कि दुष्ट को शिक्षा नहीं लगती सर्प को दूध पिलाने से ज़हर ही बढ़ता है इसी प्रकार पानी उसे अच्छा लगता जिसे प्यास लगी हो इसीलिए शिक्षा उसे देनी चाहिए जैसे शिक्षा की प्यास है अगर अहंकारीको शिक्षा दी जाती है तो उसी प्रकार हो जाता एक व्यक्ति ने एक पानी से भीगते हुए बंदर से कहा मनुष्य कैसे हाथ पैर और शरीर होते हुए भी तुमने बरसात से बचने के लिए छत क्यों नहीं बनाया इतना सुनते ही अहिंकारी बंदर ने बया पक्षी का घोंसला ही तोड़ कर फेंक दिया।शिक्षा देना उसी को सार्थक होता है जिसे स्वयं सुधार कर जागना है।

डॉ गिरीश शाक्य
आज का अपराध न्यूज़
जिला ब्यूरो चीफ मैनपुरी

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